
सब सही कैसे हो सकता है ,
भूमि के गर्भ में है ,
अंधकार गंदगी बदबू ,
सड़न और उबन,
जिसमें पलता हुआ बीज,
तेजी से अंकुआ के निकलता है ,
हरे भरे पौधे के रूप में !
वह बार बार स्मृतियों में डूब जाता है !
शायद वही रहता है उसके साथ ,
भय चिंता और घबराहट में ,
जड़ से उखड़ते उखड़ते
कहाँ आ पहुंचा है वह !
बूढी सदी थक गई है ,
पीठ पर उठाये ग्लोब !
लथपथ सी हांफती ,
जा रही है अनंत की ओर !
सब सही कैसे हो सकता है !
जी नहीं मुझे लगता है गर्भ की ये सब चीजें ही हैं जो उसे देती हैं खाद।
प्रत्युत्तर देंहटाएंभूमि के गर्भ में वो उष्मा भी है जो बीज को अंकुरित करती है .... नयी दिशा को ले जाती है आपकी रचना ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंBahut gahan anubhootiyo ki kavita likhi aapney ,accha laga ,likhti rahiye ,blogjagat ko samraddha karti rahiye,
प्रत्युत्तर देंहटाएंregards,
dr.bhoopendra
jeevansandarbh.blogspot.com
bahut hi khubsurat rachna.....
प्रत्युत्तर देंहटाएंumdaah prastuti...
mere blog par is baar..
पगली है बदली....
http://i555.blogspot.com/
सही करने की कोशिश तो कर ही सकतें हैं न !!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंBAHUT HI BEHATREEN PRASTUTI .. PADHKAR MAN KAHIN THAHAR GAYA .. AAPNE BAHUTHI GAHRI BAAT LIKHI HAI .. MERI BADHAYI SWEEKAR KARE..
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपसे निवेदन है की आप मेरी नयी कविता " मोरे सजनवा" जरुर पढ़े और अपनी अमूल्य राय देवे...
http://poemsofvijay.blogspot.com/2010/08/blog-post_21.html
इतने दिनों बाद आती हैं आप और हर बार कुछ अनोखा पन दे जाती हैं
प्रत्युत्तर देंहटाएंमेरे लेवल के ऊपर की बात है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंआशीष
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अब मैं ट्विटर पे भी!
https://twitter.com/professorashish
usha ji
प्रत्युत्तर देंहटाएंsb shi kaise ho skta hai
lekin
sb glt bhi nhi hoga
umeed pe duniya kaym jo hai .
प्रिय उषा जी, बहुत सुन्दर रचना.. स्पंदित करने वाले भावों के साथ गठा हुआ शब्द-विन्यास ..भई वाह!
प्रत्युत्तर देंहटाएंऔर हाँ! न्वोत्पल पर बड़ी गर्म बहस छिड़ी हुई है .. मुझे लगता है आप भी वहाँ हों तो बात को एक दिशा मिल पायेगी बहस का शीर्षक है "क्या देश आज़ाद है"
प्रत्युत्तर देंहटाएंbahot achcha laga.
प्रत्युत्तर देंहटाएंआप सबका बहुत बहुत धन्यवाद
प्रत्युत्तर देंहटाएंउम्मीद करती हूँ आगे भी आप लोगो का सहयोग बना रहेगा !